
॥ श्री श्याम चालीसा ॥
|| दोहा ||
बन्दौ गुरु पद प्रेम से, गिरजा सुवन मनाय ।
कृष्ण श्याम का विमलयश, सादर शीश नवाय ॥
खाटू में श्री श्याम की, झाँकी बनी ललाम ।
दर्शन से सब दुःख मिटे, सिद्ध होय सब काम ॥
|| चौपाई ||
जय जय श्याम सुरन के राजा । सुमरित सिद्ध होय सब काजा ॥
हरन पाप दुःख अघ के भारा । सब मनोरथ पूरन हारा ॥
अखिल भवन के तुम हो स्वामी । घट-घट वासी अन्तर्यामी ॥
तुम अच्युत माधव जगदीशा । तुम श्री पति सुर नर के ईशा ॥
मद्भनाभ विष्णु अवतारा । कहा कहो अनाथन नाथ तुम्हारा ॥
अगम अनूप अलख अविनाशी । माया थारी सब सुख राशी ॥
मोर मुकुट मणिमय छवि छाजै । कानन कुण्डल रुचिर विराजै ॥
कटि पीताम्बर फर-फर फरकै । भक्त दरश कर कर मन हरषे ॥
सोहत गल बिच सुन्दर माला । हंसती मूरत बाहु विशाला ॥
सूरज सन्मुख मन्दिर छाजै । पाँचों टेम झालराँ बाजै ॥
भीड़ पड़े दर्शन की भारी । जय जय कार करें नर नारी ॥
मकराने का मन्दिर छाजै । ऊपर सुवरण कलश विराजै ॥
द्वार मूर्ति बजरंग की भारी । जिनकी शोभा सबसे न्यारी ॥
भोलेनाथ परिक्रमा माहीं । दर्शन कर सुर नर बलिहारी ॥
निज मन्दिर की छवि अति छाजै । रजत सिंहासन श्याम विराजै ॥
सुवरण छत्र छटा है भारी । दर्शन कर सुर नर बलिहारी ॥
नौबत शंख नगारा बाजै । सुनत पाप सब मन के भाजै ॥
सुनि घंटा झनझन झनकारा । भूलि जात है दुःख नर सारा ॥
छाजत अति तब रूप उजारा । दर्शन से दुःख कटता सारा ॥
पाँच सिंगार होत दिन माहिं । छवि अद्भुत उपमा कुछ नाहीं ॥
भीड़ अपार दरश को आवै । मन वांछित कारज सो पावै ॥
पापी जन चरणों में लोटे । काटत कर्म पलक में खोटे ॥
कई दण्डवत करता आवै । निज इच्छा लायक वर पावे ॥
कोढ़ी निस दिन द्वार पुकारे । अपने तन का रोग निवारे ॥
अन्धे जन को ध्यान लगाहीं । खुलते नयन पलक के माहीं ॥
मनु दृढ़ करि जो तव गुन गावै । सो निपुत्र निश्चय सुत पावे ॥
धरहि ध्यान जो दृढ़ मन माहीं । ताको दुर्लभ फिर कुछ नाहीं ॥
चार पदार्थ पल में पावे । जो खाटू पति श्याम मनावे ॥
मैं मूरख शरणागत आया । मेटहु नाथ कली की छाया ॥
काटि कामना भक्ति दीजै । चरण शरण प्रभु अपनी लीजे ॥
जैसे अधम अनेकों तारे । वैसे ही दुःख हरो हमारे ॥
जै जै जै खाटू पति नाथ । सुनियो नाथ दीन की गाथा ॥
जो यह पढ़े श्याम चालीसा । तिनके कष्ट हरे गौरीशा ॥
करही पाठ जो नित चितलाई । रिद्ध सिद्ध घर होई सवाई ॥
भूत पिशाच न भय डिंग आवे । जो यह श्याम चालीसा गावे ॥
सात पाठ जो नित प्रति करही । मन इच्छा कारज सब सरहीं ॥
करहि पाठ शत जो चित लाई । तन मन सब निर्मल हो जाई ॥
सहस बार जो इसको गावे । भक्ति मुक्ति तो निश्चय पावे ॥
दास बृजलाल बरनत को बेरो । राखो शरण मम कष्ट निवेरा ॥
जब जब जन्म धरा पर पाऊं । श्याम तुम्हारे ही गुण गाऊं ॥
|| दोहा ||
सकल पाप संताप हर, कामादिक सब नाश ।
भक्ति बरनन को दीजिए, सेवक दृढ़ विश्वास ॥
॥ तीन बाण धारी की जय ॥
॥ हारे के सहारे की जय ॥
॥ शीश के दानी की जय ॥
॥ बोलो लखदातार की जय ॥
॥ जय श्री श्याम ॥

